संस्कृति के चार अध्याय - रामधारी सिंह दिनकर Sanskriti ke Char Adhyay - Hindi book by - Ramdhari Singh Dinkar
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संस्कृति के चार अध्याय

रामधारी सिंह दिनकर

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
आईएसबीएन : 9789352210848 मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पृष्ठ :728 पुस्तक क्रमांक : 9466

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प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

.......यह सम्भव है कि संसार में जो बड़ी-बड़ी ताकतें काम कर रही हैं, उन्हें हम पूरी तरह न समझ सकें, लेकिन, इतना तो हमें समझना चाहिए कि भारत क्या है और कैसे इस राष्ट्र ने अपने सामाजिक व्यक्तित्व का विकास किया है, उसके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलू कौन-से हैं और उसकी सुदृढ़ एकता कहाँ छिपी है। भारत में बसने वाली कोई भी जाति यह दावा नहीं कर सकती कि भारत के समस्त मन और विचारों पर उसी का एकाधिकार है। भारत आज जो कुछ है, उसकी रचना में भारतीय जनता के प्रत्येक भाग का योगदान है। यदि हम बुनियादी बात को नहीं समझ पाते तो फिर हम भारत को भी समझने में असमर्थ रहेंगे। और यदि भारत को नहीं समझ सके तो हमारे भाव, विचार और काम, सब-के-सब अधूरे रह जाएँगे और हम देश की ऐसी कोई सेवा नहीं कर सकेंगे, जो ठोस और प्रभावपूर्ण हो।

मेरा विचार है कि ‘दिनकर’ की पुस्तक इन बातों को समझने में, एक हद तक, सहायक होगी। इस लिए मैं इसकी सराहना करता हूँ और आशा करता हूँ कि इसे पढ़कर अनेक लोग लाभान्वित होंगे।

 

तृतीय संस्कण की भूमिका

पहले संस्करण के वक्तव्य में मैंने यह संकेत किया था कि यह पुस्तक अपूर्ण हैं, अगले संस्करण में वह पूर्ण कर दी जाएगी। लेकिन, दूसरा संस्करण इतनी जल्दी में निकाला गया कि पुस्तक पर मैं कोई काम नहीं कर सका। तीसरा संस्करण भी प्रायः अचानक ही सिर पर आ धमका। किन्तु इस बार यह उचित जान पड़ा कि नये संस्करण में विलम्ब चाहे जो हो, लेकिन इस बार अपनी सूझ-बूझ और अधुनातन अनुसंधानों के अनुसार, इस ग्रन्थ का संशोधन कर देना आवश्यक है। मेरा खयाल है, संशोधन के बाद अब यह पुस्तक पहले की अपेक्षा अधिक स्वच्छ, अधिक सुसम्बद्ध और अधिक पूर्ण हो गयी है, यद्यपि अपूर्ण यह अब भी है।

पहले संस्करण में आर्य-द्रविड़ समस्या का वृतान्त बहुत ही संक्षिप्त था। इस बार वह अधिक विस्तृत और अधिक पूर्ण मिलेगा। इसी प्रकार, ‘‘आर्य और आर्येत्तर संस्कृतियों का मिलन’’ नामक प्रकरण भी फिर से लिखा गया है। स्थापना तो इस प्रकरण की अब भी वही है जो पहले थी, किन्तु अनेक नये प्रमाणों और नयी युक्तियों के आ जाने से यह स्थापना अब अधिक प्रभावशाली हो गयी है। बौद्ध धर्म के प्रसंग में ‘‘बोद्ध साधना पर शाक्त प्रभाव’’ भी बिलकुल नया अध्याय है। पहले संस्करणों में तंत्र-साधना का वृत्तान्त था ही नहीं। इस बार भी वह संक्षेप में ही दिया गया है लेकिन उतने से भी पाठकों को यह समझने में आसानी होगी कि धर्म और काम को समन्वित करने में मध्यकालीन साधकों को उतनी कठिनाई हुई थी और बाद के साहित्य और संस्कृति पर इस प्रयोग का क्या प्रभाव पड़ा।  

इस्लाम-खंड तो पूरा-का-पूरा दुबारा लिखा गया है। इस क्रम में बहुत-सी सामग्रियाँ एक जगह से उठा दूसरी जगह डाली गयी हैं और अनेक नयी युक्तियों,  नयी शंकाओं, नये अनुमानों और नये प्रसंगों का समावेश यथास्थान किया गया है। बीसवीं सदी में आकर भारत का जो बँटवारा हुआ, उसका बीच मुगल-काल में ही शेख अहमद सरहिन्दी के प्रचार में था इस उद्धभावना को मैंने विशेष रूप से, रेखांकित किया है। आशा है, भारत की साम्प्रदायिक समस्या  के समझने में पाठकों को उससे सहायता मिलेगी।

सब से कम परिवर्तन ग्रन्थ के चौथे अध्याय में किया गया है। कम्पनी-सरकार की भाषा-नीति के बारे में जो दो-चार बातें कहीं गयी हैं, इजाफा केवल वे ही हैं। बाकी सब का-सब वहीं है, जो पहले के संस्करणों में था, यद्यपि, उपशीर्षक लगा देने से यह अंश भी अधिक आकर्षण और कम बोझिल हो गया है। हाँ, ग्रन्थ का उपसंहार पहले नहीं लिखा गया था। वह इसी संस्करण में सम्मिलित किया गया है।

ये कुछ खास प्रसंग हैं, जिन पर ध्यान आसानी से जा सकतै है। किन्तु इनके सिवा भी ग्रन्थ में, जगह-जगह, अनेक नयी बातें जोड़ी गयी हैं, अनेक बातें काट कर हटा दी गयी हैं। और अनेक अंश फिर से लिखे गये हैं। अपने जानते मैंने इस महल को झार-बुहार कर स्वच्छ कर दिया है। आशा है अब विद्वानों को नाक सिकोड़ने की जरूरत जरा कम पड़ेगी।

हिन्दी-भाषा भारतीय काफी जागरूक हैं, यह बात मैंने ‘कुरूक्षेत्र’ के प्रकाशन के समय भी देखी थी और आजकल ‘उर्वशी’ के प्रकाशन के बाद भी देख रहा हूँ। किन्तु ‘संस्कृति के चार अध्याय’ का जितना प्रबल समर्थन और जैसा कठिन विरोध हुआ, उससे भी हिन्दी-भाषियों की जागरुकता का बहुत अच्छा प्रमाण मिलता है। लगभग छ वर्षों के भीतर इस ग्रन्थ के लेखक को कोई तीन सौ पत्र प्राप्त हुए, जिनमें से अधिकांश पत्रों में ग्रन्थ-परिमार्जन के सुझाव थे। कुछ  पत्र ऐसे भी थे, जिनमें ग्रन्थ की भूरि-भूरि प्रशंसा की गयी थी। अथवा यह कहा गया था कि लेखक अज्ञानी और मूर्ख है।

इस ग्रन्थ से प्रेरित पुस्तकों, प्रचार-पुस्तिकाओं एवं  पत्र–पत्रिकाओं में प्रकाशित निबन्धों में जो कुछ लिखा गया अथवा मंचों से इस ग्रन्थ के बारे में जो भाषण दिये गये, उनसे यह पता चला कि मेरी स्थापनाओं से सनातनी भी दुखी है और आर्य-समाजी तथा ब्राह्मसमाजी भी। उग्र हिन्दुत्व के समर्थन तो इस ग्रन्थ से काफी नाराज है। नाराजगी का एक पत्र मुझे अभी हाल में एक मुस्लिम विद्वान ने भी लिखा है। ये सब अप्रिय बातें है। नाराज में किसी को भी नहीं करना चाहता। मैंने जो कुछ लिखा है, वह मेरी शिक्षा-दीक्षा और चिन्तन का परिणाम है। मेरा यह विश्वास है कि यद्यपि मेरी कुछ मान्यताएं गलत साबित हो सकती हैं, लेकिन इस ग्रन्थ को उपयोगी माननेवाले लोग दिनोंदिन अधिक होते जाएँगे। यह ग्रन्थ भारतीय एकता का सैनिक है। सारे विरोधों के बीच वह अपना काम करता जाएगा।

लेकिन, तमाम कोलाहल के बीच यह बात बिलकुल स्पष्ट हो गयी कि जिन लोगों के लिए यह पुस्तक लिखी गयी थी, उन्हें यह खूब पसन्द आयी है; नापसन्द यह उन्हें हुई जिनके लिए शायद यह है ही नहीं। खास दिलचस्पी की बात यह है कि सांस्कृतिक एकता की बातें जनसाधारण ही सुनना चाहता है; पण्डित और विशेषज्ञ ऐसी बातों से बिदक जाते है

मैंने पहले भी कहा था और आज भी दुहराता हूँ कि यह महज साहित्य और दर्शन का है। इतिहास की हैसियत यहाँ किरायेदार है। किरायेदार का आदर तो मैं करता हूं, किन्तु महल पर कब्जा देने की बात मैं नहीं सोच सकता। मैं कोई पेशेवर इतिहासकार नहीं हूँ। इतिहास की ओर में शौक से गया हूँ और शौक से ही उसकी सामग्रियों का उपयोग भी करता हूँ।

साहित्य की ताजगी और वेधकता जितनी शौकिया लेखक में होती है, उतनी पेशेवर में नहीं होती है।  कृति में प्राण उँड़ेलने का दुष्टान्त बराबर शौकिया लेखक ही देते हैं। थरथराहट पुलक और प्रकम्प, ये गुण शौकिया की रचना में होते हैं। पेशेवर लेखक अपने पेशे के चक्कर में इस प्रकार महो रहते हैं कि क्रान्तिकारी विचारों को वे खुलकर खेलने नहीं देते। मतभेद होने पर भी वे हुक्म आखिर तक, परम्परा तक ही मानते हैं।

संस्कृति का इतिहास शौकिया शैली में ही लिखा जा सकता है। इतिहासकार, अक्सर एक या दो शाखाओं के प्रामाणिक विद्वान होते है। ऐसे अनेक विद्वानों की  कृतियों में पैठकर घटनाओं और विचारों के बीच सम्बन्ध बिठाने का काम वही कर सकता है, जो विशेषज्ञ नहीं है, जो सिक्कों, ठीकरों और ईटों की गवाही के बिना नहीं बोलने की आदत के कारण मौन नहीं रहता। सांस्कृतिक इतिहास लिखने के, मेरे जानते दो ही मार्ग हैं। या तो उन्हीं बातों तक महदूद रहो। जो बीसों बार कही जा चुकी है। और, इस प्रकार, खुद भी बोर होओ और दूसरो को भी बोर करो; अथवा आगामी सत्यों का पूर्वाभास दो, उनकी खुल कर घोषणा करो और समाज में नीमहकीम कहलाओ, मूर्ख और अधपगले की उपाधि प्राप्त करो।

अनुसन्धानी विद्वान् सत्य से पकड़ता है, और समझता है, सत्य सचमुच, उसकी गिरफ्त में है। मगर इतिहास का सत्य क्या हैं? घटनाएँ मरने के साथ फोसिल बनने लगती हैं, पत्थर बनने लगती हैं। दन्तकथा और पुराण बनने लगती हैं। बीती घटनाओं पर इतिहास अपनी झिलमिली में डाल देता है, जिससे वे साफ-साफ दिखायी न पड़े जिससे बुद्धि की ऊँगली उन्हें छूने से दूर रहे। यह झिलमिल बुद्धि को कुण्ठित और कल्पना को तीव्र बनाती है, उत्सुकता में प्रेरणा भरती और स्वप्नों की गाँठ खोलती है। घटनाओं के स्थूल रूप को कोई भी देख सकता है, लेकिन उनका अर्थ वही पकड़ता है, जिसकी कल्पना सजीव हो इसलिए इतिहासकार का सत्य नये अनुसंधानों से खंडित हो जाता है, लेकिन, कल्पना से प्रस्तुत चित्र कभी भी खण्डित नहीं होते।
जिन सीधे-सादे पाठकों के मन पर पूर्वाग्राहों की छाया नहीं है, उन्हें कल्पक की कृति सचाई का उससे हाल बतायेगी, जितना इतिहास के प्रामाणिक ग्रन्थों से जाना जा सकता है। प्रामाणिक ग्रन्थों के तथ्य शायद ही कभी गलत पाये जाएँ, लेकिन, उनका विवरण हमेशा गलत और निर्जीव होता है।

 

रामधारी सिंह दिनकर

 

लेखक का निवेदन

 

प्रथम संस्मरण से

 

एक समय मैं इतिहास का विद्यार्थी अवश्य था, किन्तु जब से कविता और निबन्ध में लगा, तब से इतिहास के साथ मेरा सम्पर्क, एक प्रकार से, छूट-सा गया। तब सन् 1950 ई० मैं छात्रों को साहित्य पढ़ाने के लिए कॉलेज भेजा गया। वहाँ साहित्य की सामासिक पृष्भूमि समझने के क्रम में मुझे इतिहास की पुस्तकें फिर से उलटनी पड़ी और, धीरे-धीरे, मैं फिर से इतिहास की गहराई में उतरने लगा। मेरी पहली जिज्ञासा यह थी कि हमारा आधुनिक साहित्य हमारे प्राचीन साहित्य से किन-किन बातों में भिन्न है और इस भिन्नता का कारण क्या है ? कारण की खोज करता हुआ मैं ढूँढ़-ढूँढ़ कर 19वीं शती के सांस्कृतिक जागरण का हाल पढ़ने लगा। फिर जिज्ञासा कुछ और विस्तृत हो गयी और मन ने जानना चाहा कि भारतीय संस्कृतिक का सम्पूर्ण इतिहास कैसा रहा है।

लगभग दो वर्षों के अध्ययन के पश्चात् मेरे सामने यह सत्य उद्धासित हो उठा कि भारतीय संस्कृति में चार बड़ी क्रांन्तियां हुई हैं और हमारी संस्कृति का इतिहास उन्हीं चार क्रान्तियों का इतिहास है। पहली क्रान्ति तब हुई, जब आर्य भारतवर्ष में आये अथवा जब भारतवर्ष में उनका आर्येतर जातियों से सम्पर्क हुआ। आर्यों ने आर्येतर जातियों से मिलकर जिस समाज की रचना की, वही आर्यों अथवा हिन्दुओं का बुनियादी समाज हुआ और आर्य तथा आर्येतर संस्कृतियों के मिलन से जो संस्कृति उत्पन्न हुई, वही भारत की बुनियादी संस्कृति बनी। इस बुनियादी भारतीय संस्कृति के लगभग आधे उपकरण आर्यों के दिए हुए हैं। और उसका दूसरा आधा आर्येतर जातियों का अंशदान है।

दूसरी क्रान्ति तब हुई, जब महावीर और गौतम बुद्ध ने इस स्थापित धर्म या संस्कृति के विरुद्ध विद्रोह किया तथा उपनिषदों की चिन्ताधारा को खींच कर वे अपनी मनोवांक्षित दिशा की ओर ले गये। इस क्रान्ति ने भारतीय संस्कृति की अपूर्व सेवा की, अन्त में, इसी क्रान्ति के सरोकार में शैवाल भी उत्पन्न हुए और भारतीय धर्म तथा संस्कृति में जो गँदलापन आया वह काफी दूर तक, उन्हीं शैवालों का परिणाम था।

तीसरी क्रान्ति उस समय हुई जब इस्लाम, के विजेताओं के धर्म के रूप में, भारत पहुँचा और देश में हिन्दुत्व के साथ उसका सम्पर्क हुआ और चौथी क्रान्ति हमारे अपने समय में हुई, जब भारत में यूरोप का आगमन हुआ तथा उसके सम्पर्क में आकर हिन्दुत्व एवं इस्लाम दोनों ने नव-जीवन का सम्भव किया।

इस पुस्तक में इन्हीं चार क्रांतियों का संक्षिप्त इतिहास है। पुस्तक का उचित नाम कदाचित, ‘भारतीय संस्कृति के चार सोपान’ होना चाहिए था।, किन्तु, वह नाम मन में आकर फिर लौट गया और मुझे यही अच्छा लगा कि इस पुस्तक को मैं ‘संस्कृति के चार अध्याय’ कहूँ।

पुस्तक लिखते-लिखते इस विषय में मेरी आस्था और भी बढ़ गयी कि भारत की संस्कृति, आरम्भ से ही, सामासिक रही है। उत्तर-दक्षिण पूर्व पश्चिम देश में जहां भी जो हिन्दू बसते है। उनकी संस्कृति एक है एवं भारत की प्रत्येक क्षेत्रीय विशेषता हमारी इसी सामासिक संस्कृति की विशेषता है। तब हिन्दू एवं मुसलमान हैं, जो देखने में अब भी दो लगते हैं। किन्तु उनके बीच भी सांस्कृतिक एकता विद्यमान है जो उनकी भिन्नता को कम करती है। दुर्भाग्य की बात है कि हम इस एकता को पूर्ण रूप से समझने में समर्थ रहे है। यह कार्य राजनीति नहीं, शिक्षा  और साहित्य के द्वारा सम्पन्न किया जाना चाहिए। इस दिशा में साहित्य के भीतर कितने ही छोटे-बड़े  प्रयत्न हो चुके है,। वर्तमान पुस्तक भी उसी दिशा में एक विनम्र प्रयास है।

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