मीडिया हूँ मैं - जय प्रकाश त्रिपाठी Media Hu Mai - Hindi book by - Jai Prakash Tripathi
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मीडिया हूँ मैं

जय प्रकाश त्रिपाठी

प्रकाशक : अमन प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :608
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 9060
आईएसबीएन :9789383682348

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यह पुस्तक नहीं अभियान है। यह पुस्तक उनके लिए है जो पत्रकारिता के मूल्यों पर निछावर हो गये.....

Media Hu Mai - A Hindi Book by Jai Prakash Tripathi

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

इन दिनों, जब मीडिया इंडस्ट्री को सबसे तेज भागती और नित नया रूप बदलती इंडस्ट्री का तमगा दिया जा रहा है, तब यह जरूरी हो जाता है कि इस मिशन की न केवल गंभीर पड़ताल की जाए, बल्कि उसके उन तत्वों को खंगाला जाए, जिन्होंने इसे रचने और मांजने में योगदान दिया है। जाहिर है कि अगर मीडिया के भीतर से इसकी शुरुआत हो तो सही मायनों में हम मीडिया के बदलावों, उसमें पनपती नए जमाने की फितरतों और पूंजी और मुनाफे की मुठभेड़ में कहीं खोती जा रही असल खबरों की जरूरतों के साथ-साथ पत्रकारों के लिए तैयार हो रही पगडंडियों पर बेहतर बात कर पाएंगे।

वरिष्ठ पत्रकार जयप्रकाश त्रिपाठी की पुस्तक ‘मीडिया हूं मैं’ इसी तरह की पड़ताल की कमी को पूरा करती है। नया होता मीडिया अपने नए-नए उपक्रमों के सहारे तेजी से विस्तार ले रहा है। इंटरनेट ने मीडिया के कई खांचों को पूरी तरह बदल दिया है। संपादक नाम की संस्था अब असंपादित टिप्पणियों वाले आभासी साम्राज्य के आगे बेबस-सी है। सोशल मीडिया के नाम से अगर लोगों को वैकल्पिक माध्यम मिला है तो मोबाइल जैसे टूल ने नागरिक पत्रकारों और नागरिक पत्रकारिता जैसे नए आयाम हमारे सामने प्रस्तुत कर दिए हैं। फेसबुक और ट्विटर ने मीडिया के मायनों को फिर से परिभाषित करने पर मजबूर किया है। जाहिर है कि समय बदला है और जरूरतें भी। ऐसे में ‘मीडिया हूं मैं’ पुस्तक मीडिया की कहानी को मीडिया की ही जुबानी सुनाने का प्रयास करती है। छह सौ से अधिक पृष्ठों वाली इस पुस्तक में जयप्रकाश त्रिपाठी ने पत्रकारिता में 32 वर्षों के अपने अनुभवों के साथ साथ कई अन्य नामचीन पत्रकारों के विचारों को भी संकलित-प्रस्तुत किया है। मीडिया में अपना भविष्य खोज रहे युवाओं के लिए भी ढेर सारी ऐसी जरूरी जानकारियां इस पुस्तक में हैं, जो एक साथ किसी एक किताब में आज तक उपलब्ध नहीं हो सकी हैं। मीडिया के बनने और फिर नए रास्तों पर चलकर नई-नई मंजिलें पाने तक की रोचक यात्रा की झलकियां तथ्यतः इस पुस्तक में पढ़ने को मिलती हैं।

पत्रकारिता का श्वेतपत्र, मीडिया का इतिहास, मीडिया और न्यू मीडिया, मीडिया और अर्थशास्त्र, मीडिया और राज्य, मीडिया और समाज, मीडिया और कानून, मीडिया और गांव, मीडिया और स्त्री, मीडिया और साहित्य जैसे दसाधिक अध्यायों से गुजरते हुए लेखक के अनुभवों के सहारे इस पुस्तक में बहुत-कुछ जानने को मिलता है। इन अध्यायों में जिस तरह समय के अनुरूप ऐतिहासिक और आधुनिक मीडिया जगत को विश्लेषित किया गया है, वह अंतरविषयक जरूरतों को तो पूरा करता ही है, मीडिया के साथ विषय-वैविध्यपूर्ण रिश्तों की आवश्यक पड़ताल भी करता है। लेखक ने अपनी बात को स्थापित करने के लिए जिस तरह अन्य पत्रकारों के उद्धरणों का सहारा लिया है, वह भी सराहनीय है। पहले-पहल तो पुस्तक किसी लिक्खाड़ की आत्मकथा-सी लगती है, लेकिन धीरे-धीरे पृष्ठ-दर-पृष्ठ यह एक ऐसे दस्तावेज की तरह खुलने लगती है, जिसमें विरासत की पड़ताल के साथ-साथ अपने समय और मिशन के साथ चलने की जिद की गूंज सुनाई देने लगती है।

लेखक की पंक्तियों पर गौर करें तो वे मीडिया की बदलती तस्वीर से उसी तरह परेशान लगते हैं, जिस तरह समाज की विद्रूपता से हम सब। मीडिया को लेकर लेखक की गंभीरता इन शब्दों में साफ झलकती है - ‘मैं सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं, लड़ने के लिए भी। मनुष्यता जिसका पक्ष है, उसके लिए। जो हाशिये पर हैं, उनका पक्ष हूं मैं। उजले दांत की हंसी नहीं, मीडिया हूं मैं। सूचनाओं की तिजारत और जन के सपनों की लूट के विरुद्ध। जन के मन में जिंदा रहने के लिए पढ़ना मुझे बार-बार। मेरे साथ आते हुए अपनी कलम, अपने सपनों के साथ। अपने समय से जिरह करती बात बोलेगी। भेद खोलेगी बात ही।...’ तय है कि यह पुस्तक नये पत्रकारों और पत्रकारिता के प्रशिक्षुओं के साथ-साथ मीडिया को समझने की ललक रखने वालों से बेहतर संवाद करने और उन्हें कुछ नया बताने-सिखाने में सफल होती है।

प्रसिद्ध कथाकार ममता कालिया के शब्दों में ‘मीडिया हूं मैं’ में लेखक ने अपने पत्रकारीय जीवन से जुड़े दशकों के अनुभव को सहेजने की कोशिश की है। प्रसिद्ध साहित्यकार रवींद्र कालिया कहते हैं - ‘मीडिया हूं मैं’ पुस्तक में कई ऐसी जानकारियां हैं, जिनसे तो मैं भी पहली बार परिचित हो सका।’ माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय (नोएडा) के निदेशक प्रो.जगदीश उपासने का कहना है कि ‘पत्रकारिता में अपना भविष्य देख रहे छात्रों एवं युवाओं के लिए ‘मीडिया हूं मैं’ एक संग्रहणीय एवं अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक है।’ प्रसिद्ध हिंदी कथाकार संजीव कहते हैं - ‘मीडिया हूं मैं’ पुस्तक में सच्चाइयों पर दुस्साहसिक तरीके से कलम चलाने का जोखिम उठाया गया है।

मीडिया का श्वेतपत्र

चौथा स्तंभ। मीडिया हूं मैं। सदियों के आर-पार। संजय ने देखी थी महाभारत। सुना था धृतराष्ट्र ने। सुनना होगा उन्हें भी, जो कौरव हैं मेरे समय के। पांडु मेरा पक्ष है। प्रत्यक्षदर्शी हूं मैं सूचना-समग्र का। संजय का ‘महाभारत लाइव’ था जैसे। अश्वत्थामा हाथी नहीं था। अरुण कमल के शब्दों से गुजरते हुए जैसेकि हमारे समय पर धृतराष्ट्र से कह रहा हो संजय- ‘किस बात पर हंसूं, किस बात पर रोऊं, किस बात पर समर्थन, किस बात पर विरोध जताऊं, हे राजन! कि बच जाऊं।’ मैं पराजित नहीं हुआ था स्वतंत्रता संग्राम में। ‘चौथा खंभा’ कहा जाता है मुझे आज। ‘चौथा धंधा’ हो गया हूं मैं। वह संजय था, उस महाभारत का। मीडिया हूं मैं इस महाभारत का। निर्वासित कर दिया है मुझे ‘पेजथ्री’ के लिए। लाक्षागृह सुलगने के ठहाके आ रहे हैं मेरे भी कानों तक। फिर भी किंचित विचलित नहीं। स्वयं से पूरी तरह आश्वस्त अपने स्वातंत्र्ययुद्ध की उन अंतिम प्रतीति और सुखद परिणतियों से। मेरी प्राणवायु में है ‘एक्टा डिउना’ के जन्म से ‘पैगामे हिन्द’, ‘बंगाल गजट’, ‘उदंत मार्तंड’, सोशल मीडिया तक का आद्योपांत यात्रा-वृत्तांत। अंतहीन-सा। चलता चला आ रहा हूं मैं। आज भी मुझमें गूंज रहा वंचित-स्वर। काले कारपोरेट से वंचित। आक्रमण किया था कौरवों ने। तो पांडवों ने भी। मेरे समय के कौरव। पेड न्यूज के पतित। विस्मृत नहीं, सन सत्तावन से पहले और बाद की महाभारत! ‘यदा-यदा ही धर्मस्य..... न दैन्यं, न पलायनम’ से मंत्रविद्ध मैं अनायास-सा महाभारत या कि स्वतंत्रता संग्राम की सहमतियों में वर्तमान मीडिया साम्राज्य के विरुद्ध स्वयं को मुखर कर लेता हूं। मीडिया हूं मैं। महाभारत 18 दिन तक होती रही। वेदव्यास ने गीता में 18 अध्याय लिखे। कौरव-पांडवों की सेना की 18 टुकड़ियां थीं। युद्ध के मुख्य सूत्रधार 18 थे। युद्ध के बाद शेष रह गये योद्धा 18 थे। और आज मीडिया महाभारत में शत्रुकुल का नेटवर्क-18, अदभुत संयोग जैसा।

महाभारत, स्वतंत्रता संग्राम के साम्राज्यवाद विरोधी युद्धों की तरह वर्तमान मीडिया साम्राज्य भी आजादी के एक और आंदोलन के लिए देश के बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और सूचना के अधिकार से संपन्न विशाल जनसमुदाय को आज मानो ललकार रहा है। कौरवों ने पांच गांव देने से इनकार कर दिया था, अंग्रेजों ने पूरा देश और मीडिया मठहारों ने पत्रकारों, बुद्धिजीवियों को सुई की नोंक भर भी साझेदारी नहीं। मैं पत्रकारिता की पुस्तक भी हूं, अपने समय, अपने समाज का आईना भी। मुझमें वह सब है, जो पत्रकारिता के लिए सत्य है, सुंदर है, शिव है। मैं उनके लिए हूं, जिन्हें अपने जीवन की सुंदरता से अथाह प्यार है। जिन्हें स्वयं के मनुष्य होने पर गर्व है। जो बेहतर मनुष्यों के बेहतर समाज के निर्माण के सपने देखते हैं। जो सबसे पहले, सबसे अधिक मनुष्यता से प्यार करते हैं। उस पर विश्वास करते हैं जो। वह हूं मैं। मीडिया हूं मैं। मुझमें पत्रकारिता के समस्त प्रिय छात्रों को अपने भविष्य के सपनों की अनगिनत छवियां दृष्टिगोचर हो रही हैं। ताकि वह पत्रकारों की ऐसी पीढ़ी का आधार स्तंभ बन सकने का साहस कर सकें, जिससे चौथा स्तंभ शर्मिंदित न हो फिर कभी।

मेरे इस श्वेतपत्र में उन पत्रकार साथियों का दुखदर्द, जहर पीते-पीते नीली पड़ गयी अथाह पीड़ा और आक्रोश साझा है, जिनके लिए बने श्रमजीवी कानूनों को अपहृत कर लिया गया है, जिनके लिए वेजबोर्ड की पंचायतें अनसुनी-अनावश्यक-सी कर दी गयी हैं। इसमें उन अतिशोषित स्ट्रिंगरों और ग्रामीण पत्रकार साथियों की रोषभरी आपबीती भी है, जिन्हें प्रतिदिन बारह से सोलह घंटे तक काम के बदले महीने में दुत्कार जैसा हजार-पांच सौ रुपये का मानदेय थमा दिया जाता है, और सिरहाने बैठे सेठ की खतरनाक चुप्पी के सम्मान में, जिनसे एनजीओ चला रहे लाइजनर संपादक मिलना भी पसंद नहीं करते हैं। सिर्फ दाम का हिसाब मांगते रहते हैं, काम के पारिश्रमिक का नहीं। ‘उनकी पत्रकारिता’ के इस श्वेतपत्र में पेडन्यूज का आद्योपांत इतिहास है, और है मतदाताओं, पाठकों, चुनाव आयोग और प्रेस परिषद की आंखों में धूल झोंकते हुए लाखों-करोड़ों रुपये उगाह कर विज्ञापनों को समाचार के रूप में परोसने वाले सफेदपोशों का कमंडलाचार भी।

आओ, मेरे समय के साथियों, मेरे शब्दों के साक्षी, मेरी भाषा, मेरी सड़क के लोगों। एक स्त्री (प्रमिला त्रिपाठी) के आभूषण गिरवी रखकर मेरा उदभव संभव हो सका है। आओ, तलाश शुरू करें कि कहां है हमारे स्वतंत्रता संग्राम के पुरखों का चौथा खंभा! और कौन हैं ‘चौथा धंधा’ के किरदार! क्या कहा था भगत सिंह, गणेशंकर विद्यार्थी, बाबू विष्णुराव पराड़कर, माखनलाल चतुर्वेदी ने, और उनके शब्दों का स्वाभिमान आज किस तरह कुचल रहे हैं कारपोरेट आखेटक। आओ, उनके धंधे की चट्टान तोड़ें, उनकी काली लहरों का मुंह मोड़े। नहीं, तो एक-न-एक दिन पूरी तरह सोख लेगी मुर्दों की हंसी हमारी अभिव्यक्ति की आजादी की एक-एक बूंद। आओ साथी, दुनिया में लड़ने की जरूरत अभी बाकी है। हम लड़ेंगे, चुनेंगे जिन्दगी के टुकड़े प्रश्न के कन्धों पर चढ़कर...बांग्ला के विप्लवी रचनाकार काज़ी नज़रुल इस्लाम की इन पंक्तियों के साथ- बोलो, वीर बोलो, उठा हूँ मैं....

मीडिया का इतिहास

इतिहास का भावार्थ है- ‘यह निश्चय था’। इति-ह-आस, अस् धातु, लिट् लकार है ‘इतिहास’ का संधि-विग्रह। ग्रीस में इतिहास को ‘हिस्तरी’ कहा जाता था। ‘हिस्तरी’ यानी बुनना, मानव समाज के आगत अतीत, बीते देश-काल, परंपरा से प्राप्त उपाख्यान, साक्ष्य आदि को तथ्यतः, सुसंबद्ध रूप में चित्रित करना इतिहास है। ‘मीडिया’ अंग्रेजी शब्द ‘मीडियम’ का बहुवचन है। प्रतिदिन की सूचनाओं के संकलन और प्रस्तुतीकरण को अंग्रेजी में ‘जर्नलिज्म’ कहा जाता हैं। यह जर्नल शब्द से बना है। शाब्दिक अर्थ है- ‘दैनिक’। ‘जर्नलिज्म’ फ्रैंच भाषा के शब्द ‘जर्नी’ से बना है। मीडिया का इतिहास कई राहों से गुजरता है। प्रश्न उठता है, आज सही इतिहास क्या है? वह, जो मात्र किताबी है या कुछ और! भारतीय मीडिया का इतिहास आजादी के आंदोलन से मुखर होता है। जब तोप मुकाबिल होती है। स्वतंत्रचेता हमारे क्रांतिकारी पुरखे ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध अखबार को अस्त्र बनाते हैं। महाभारत कालीन आख्यान में प्रथम पत्रकार संजय अंधे धृतराष्ट्र के लिए ‘कुरुक्षेत्र लाइव’ प्रसारित करते हैं। पौराणिक आख्यानों में इसी तरह नारद और हनुमान चित्रित हैं, लेकिन जीवन की बहुमुखी व्यापकता के कारण स्वल्प सामग्री के सहारे विगत युग अथवा समाज का चित्रनिर्माण करना दुस्साध्य है। हमारे लिए यह और भी दुष्कर है क्योंकि आजादी के आंदोलन की पत्रकारिता का भी हमारे समय में (पूंजी में) परकाया प्रवेश हो चुका है। ‘तोप’ का पर्यायवाची ‘पूंजी’ हो गयी है। पहले सेठाश्रयी थी। अब न्यूज पेपर इंडस्ट्री कही जाती है। माध्यम अर्थात अंग्रेजी का शब्द मीडिया है। अर्थ है मीडियम। शासक और शासित के बीच संवाद सेतु। पत्रकारिता और माध्यम की विषय-वस्तु अलग-अलग हैं। पत्रकारिता के वेश में मीडिया नये जमाने का संचार माध्यम है। ‘पत्रकारिता’ को अकाल दंडित-विस्थापित कर प्रभुवर्ग ने ‘मीडिया’ के रूप में उसका बाजारीकरण कर दिया है।

इतिहास की संपूर्णता असाध्य भी कही जाती है। इतिहास न तो पूर्णतः विज्ञान और कल्पनाओं का समुच्चय होता है, न साहित्य का सृजन। हर समय कोई न कोई प्रश्न अपने इतिहास में वर्तमान का समाधान ढूंढ़ता रहता है। इस मीडिया का इतिहास आज गड्डमड्ड-सा हो गया है, जो आजादी के साढ़े छह दशक बाद सूचना क्रांति, विज्ञान एवं अनुसंधान के विभिन्न चरणों से गुजरते हुए पेज-थ्री के पन्नों पर लोट-पोट रहा है। अन्य विषयों की तरह मीडिया की भी प्राथमिक शिक्षा अपने समय के इतिहास से प्रारंभ होती है। हर समय (मिथक नहीं) अपने इतिहास से सबक लेता है। मीडिया के इतिहास से हमारे समय ने क्या सबक लिया है, क्या लेना चाहिए था। जानना ही होगा कि क्या है, जो नहीं लिखा जा रहा है, जो नहीं लिखने दिया जा रहा है! मीडिया के इतिहास के अध्ययन और अध्यापन में आज जनता का पक्ष मूक-बधिर क्यों है। इतिहास मीडिया का हो या किसी और का, उसका पक्ष जनता का है तो चिंता भविष्य की होनी चाहिए। वह समकालीन नहीं, ठहरा हुआ, सड़ा हुआ है तो सामाजिक परिप्रेक्ष्य में अवश्य दिशाहीन होगा। नये सिरे से खोज करते हुए जर्नलिज्म के छात्र ही नहीं, समस्त भारतीय समाज के समकालीन मीडिया के इतिहासबोध के लिए आज आद्योपांत एक ऐसी पुनर्रचना अपरिहार्य-सी है, जो हमे अपने व्यापक सामाजिक सरोकारों के साथ चलने का रास्ता दिखाये। यह अत्यंत दुखद और गंभीर प्रश्न है कि मीडिया के समाजशास्त्र और इतिहास पर हमे आज इस तरह क्यों सोचना चाहिए?

विश्व पत्रकारिता के इतिहास में कागज और मुद्रण के अविष्कार के साथ समाचारपत्र का जन्म हुआ था। हिंदी मीडिया के इतिहास पर विद्वानों की अलग-अलग राय है।

प्रो. रामशरण जोशी ने हिंदी पत्रकारिता को मुख्यरूप से तीन कालों में विभाजित किया है। आधुनिक पत्रकारिता का जन्म अठारहवीं शताब्दी से बताया जाता है। उन्नीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में मद्रास के गवर्नर सर टॉमस मुनरों ने प्रेस की आजादी को खतरनाक करार दिया। स्वतंत्रता संग्राम के समय से पत्रकारिता के इतिहास में आगरा के अलग तेवर रहे हैं। आजादी के आंदोलन के दौरान अखबारी इतिहास में बुंदेलखंड की गौरवपूर्ण भूमिका रही है। बिहार में पत्रकारिता की शुरुआत उर्दू पत्रों ने की थी।

वैश्विक सूचना प्रणाली (वेब) का विचार इसाक असिमोव की मार्च 1959 की लघु कहानी ‘एनिवर्सरी’ से माना जाता है। ऑन लाइन मीडिया का इतिहास रेडियो प्रसारण सेवा के इतिहास से जुड़ा है। भारत में सबसे पहले रेडियो का प्रसारण 1923 में कोलकाता के एक क्लब द्वारा किया गया था। वेब जर्नलिज्म का इतिहास काफी रोचक-रोमांचक है। मीडिया के इतिहास में प्रसारण एक क्रांतिकारी विकास माना जाता है। भारत में वेब पत्रकारिता का इतिहास लगभग डेढ़ दशक पुराना है।

संक्षेप

इसी तरह यह पुस्तक आगे अन्य दसाधिक अध्यायों में मीडिया और न्यू मीडिया, मीडिया और अर्थशास्त्र, मीडिया और राज्य, मीडिया और समाज, मीडिया और कानून, मीडिया और गांव, मीडिया और स्त्री, मीडिया और साहित्य पर सविस्तार संकलित तथ्यों से पाठक के मन और विवेक को अनवरत अपने साथ जोड़े रहती है।


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