डार्क रूम - आर. के. नारायण Dark Room - Hindi book by - R. K. Narayan
लोगों की राय

नारी विमर्श >> डार्क रूम

डार्क रूम

आर. के. नारायण

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2011
आईएसबीएन : 9788170288121 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :128 पुस्तक क्रमांक : 7856

Like this Hindi book 2 पाठकों को प्रिय

24 पाठक हैं

पति-पत्नी के बनते-बिगड़ते सम्बन्धों का बहुत ही मार्मिक और हृदयस्पर्शी चित्रण करता एक रोचक उपन्यास...

Dark Room - A Hindi Book - by R. K. Narayan

इस उपन्यास में पति-पत्नी के बनते-बिगड़ते सम्बन्धों का बहुत ही मार्मिक और हृदयस्पर्शी चित्रण किया गया है। साहित्य अकादमी से पुरस्कृत आर. के. नारायण की अन्य लोकप्रिय पुस्तकें हैं—‘मालगुड़ी की कहानियाँ’, ‘स्वामी और उसके दोस्त’, ‘गाइड’ और ‘इंग्लिश टीचर’।

दाम्पत्य जीवन के उतार-चढ़ाव पर आधारित आर. के. नारायण का यह उपन्यास पाठक के दिल को छू जाता है। शादी का रिश्ता निभाने के लिए पति और पत्नी दोनों को क्या-क्या समझौते करने पड़ते हैं, यही है इस रोमांचक पुस्तक का केन्द्रबिंदु।

1906 में जन्मे नारायण का पूरा नाम रसीपुरम कृष्णास्वामी अय्यर नारायणस्वामी था। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित आर. के. नारायण ने अपने जीवन में पन्द्रह उपन्यास, कहानियों के पांच खण्ड, अनेक यात्रा-वृत्तांत लिखे, और महाभारत व रामायण के अंग्रेजी अनुवाद किये हैं और अंग्रेजी भाषा में लिखने वाले भारतीय लेखकों में वे सबसे अधिक लोकप्रिय हैं।

 

1

 

स्कूल का समय हुआ तो बाबू की तबियत अचानक खराब हो गई और सावित्री ने उसे बिस्तर पर आराम से लिटा दिया। लेकिन वह ज्यादा देर तक आराम नहीं कर सका, क्योंकि रमानी ने आकर पूछा, ‘क्या बात है ?’
‘कुछ नहीं’, सावित्री जवाब देकर किचेन में घुस गई। अब रमानी ने मरीज़ की तरफ रुख किया और आवाज़ लगाई, ‘सावित्री !’ सावित्री जवाब देती तब उसने दो और आवाज़ें लगाईं और पूछा, ‘बहरी हो गईं क्या ?’
‘नहीं, मैं सिर्फ...’
‘बाबू को क्या हुआ है ?’
‘तबियत ठीक नहीं है उसकी।’

‘तुम फौरन उसे बीमारी का सर्टिफिकेट दे देती हो। बाबू, उठो, और स्कूल जाओ। किसी हालत में छुट्टी करने की जरूरत नहीं है।’
बाबू ने सवालिया नजरों से माँ की ओर देखा। सावित्री बोली, ‘लेटे रहो, बाबू। तुम आज स्कूल नहीं जाओगे।’

रमानी ने कहा, ‘तुम अपने काम से मतलब रखो। सुना तुमने...?’
‘लड़के को बुखार है।’

‘कोई बुखार-वुखार नहीं है। तुम किचेन में जो मर्जी हो करो, बच्चे की जिम्मेदारी मेरे ऊपर है। तुम औरतों का इससे कोई मतलब नहीं है।’
‘तुम्हें बच्चे की हालत दिखाई नहीं देती...?’
‘ठीक है, ठीक है। मुझे दफ्तर के लिए देर हो रही है, ‘रमानी ने चिढ़कर कहा और खाने के कमरे में चला गया।
बाबू ने कपड़े पहने और स्कूल की तैयारी की। सावित्री ने उसे एक गिलास दूध पिलाया और रवाना कर दिया। इसके बाद वह किचेन में पहुँची। पति ने खाना शुरू कर दिया था, रसोइया उसे परोस रहा था।

सावित्री ने फिर कहना शुरू किया, ‘तुम्हें दिखाई नहीं दिया कि लड़का कितना बीमार है ?’
रमानी ने इस बात का जवाब नहीं दिया, उलटे एक नया सवाल पूछ लिया, ‘आज खाने की सब्ज़ी किसने चुनी है ?’
‘क्यों ?’

‘बैंगन, ककड़ी, गाजर और पालक-साल के बारहों महीने और महीने के तीसों दिन यही सब्ज़ियाँ खानी पड़ती हैं। पता नहीं, कब इस घर में कुछ ढंग का खाने को मिलेगा। इसी खाने के लिए मैं दिन भर दफ्तर में काम करता हूँ। और पचास खर्चे करोगी—इसके लिए पैसा चाहिए, उसके लिए चाहिए...। रसोइया ठीक से नहीं बना सकता तो खुद खाना बनाओ। इसके अलावा और क्या काम है तुम्हारा...।’

सावित्री पति और रसोइये के बीच घूम-घूमकर केले के पत्ते में रखी सब्ज़ियाँ देखती रही और कहती रही, यह लाओ, वह लाओ। लेकिन यह काम बहुत आसान नहीं था क्योंकि खाने-पीने के मामले में रमानी की आदतें बहुत अनोखी थीं। ‘न जाने कब से तुम मुझे यह ककड़ी ही खिला रही हो। क्या मैं इसी के लिए ज़िन्दा हूँ ?’ ज़रा सी भी देर हो जाती तो वह कहता, ‘अच्छा, इस ककड़ी की सब्जी के लिए मुझे दफ्तर से छुट्टी लेनी पड़ेगी ! क्या बात है ! और मंडी की सबसे सस्ती सब्जी के लिए भी लोग इतने कंजूस क्यों हो जाते हैं....दो-चार टुकड़ों में ही पूरे परिवार को निबटा देना चाहते हैं। कुछ ज्यादा भी बनाई जा सकती थी यह...। खर्च कम करना है इसलिए...लेकिन और चीजों में तो खर्च कम नहीं किया जाता...।’

सावित्रि बिना कोई जवाब दिये उसका भाषण सुनती रहती, और उसकी चुप्पी भी उसे बरदाश्त नहीं होती थी। ‘चुप रहकर ताकत इकट्ठी कर रही हो ! क्या करोगी इस ताक़त का ? जब कोई कुछ पूछता है, तो उसकी बात का जवाब न देकर तुम उसकी इज्ज़त नहीं बढ़ातीं।’ लेकिन जब वह कुछ जवाब देती—कभी-कभी वह बोल भी उठती थी—तो वह चिल्लाकर कहता, ‘चुप रहो ! तुम्हारे शब्दों से सब्ज़ी स्वादिष्ट नहीं हो जायेगी !’

खाना खाकर वह अपने कमरे में गया और दफ्तर जाने के लिए कपड़े पहनने लगा। इन पर वह बहुत ध्यान देता था, लेकिन जल्दबाजी भी करता जिससे मामला बिगड़ जाता था। वह नौकर रंगा को बार-बार कहता कि जूतों पर ठीक से पालिश क्यों नहीं हुई है, पैंट के बायीं क्रीज़ एकदम बेकार है, कोट हैंगर पर उलटा-सीधा टँगा है और जेबें बाहर निकली हुई हैं...। कई दफा वह सावित्री से जवाब तलब करता कि बटन क्यों ठीक नहीं लगे हैं या मोज़े के तलवे फटे हुए हैं...या वह रंगा पर नजर क्यों नहीं रखती। हर कपड़े पर वह नुक्ता-चीनी करता, लेकिन जहाँ तक टाई का सवाल है, उसे वह किसी को नहीं छूने देता था और खुद सँभालकर रखता था। टाई की तह बनाये रखने के लिए उन्हें वह तीन मोटी किताबों में दबाकर रखता था—ये किताबें थीं अन्नाडेल की खूब मोटी डिक्शनरी, बायरन के समग्र संकलन एक महाग्रंथ और ‘इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका’ का कहीं से प्राप्त एक खंड—इनके पन्नों के बीच वह टाइयों को दबा-दबाकर रखता था।

वह सिल्क का सूट पहनकर और धूप का टोप लगाये वह दरवाजे पर आ खड़ा होता और आवाज़ लगाता, ‘अरे, कौन है वहाँ ?’ जिसका मतलब होता था, ‘सावित्री, बाहर आओ और मुझे विदा करो।’ सावित्री निकलकर आती तो वह कहता, ‘दरवाज़ा बंद कर लो।’

‘पैसे खत्म हो गए हैं...शाम के लिए सब्ज़ी खरीदनी है।’
‘एक रुपया काफी होगा ?’ यह कहकर उसने रुपया उसके हाथ में रख दिया और बाहर निकल गया। कुछ क्षण तक सावित्री गैरेज से निकाली जाती पुरानी शैवरले गाड़ी की फूँ-फाँ सुनती, जो आसानी से चलने को तैयार नहीं होती थी। फिर जब गाड़ी बाहर सड़क पर चल पड़ती तो चारों ओर शांति छा जाती।

इसके बाद सावित्री का काम होता अपने देवी-देवताओं से संबंध बनाना। वह पूजा के कमरे में जाती, दीपक और धूप जलाती, सामने खड़ी मूर्तियों पर चमेली और कनेर के फूल चढ़ाती और सालों पहले माँ से सीखी सभी प्रार्थनाएं और मंत्र क्रमवार बोल जाती। फिर वह जमीन पर सीधे लेटकर प्रणाम करती—और इसके बाद उठकर किचेन में जाती, और पत्ता लेकर खाने बैठ जाती। रसोइया मुँह फुलाये उसे खाना परसता। वह पूछता, ‘आज का खाना खराब था, मैडम ?’ वह अपनी आलोचना से बहुत परेशान होता था और जब तक रमानी किचेन में रहता, काँपता रहता था।

‘आज तुम्हें बैंगन नहीं बनाने चाहिए थे। कल भी तो बनाये थे,’ सावित्री बोली, ‘अब हफ्ते भर इन्हें मत बनाना।’
‘ठीक है, मैडम। आज का खाना बहुत खराब है क्या ?’

‘खराब तो नहीं है। हाँ, चटनी में इमली ज़रा कम डालनी थी। तुम्हारे मालिक को इमली ज्यादा पसंद नहीं है।’
रसोइया घुग्घू की तरह चुपचाप उसे खाना खिलाता रहा। रोज़ यह इसी तरह होता था। वह आलोचना और भूख, दोनों से परेशान रहता था, भूख इसलिए कि उसे ही सबसे अंत में काने को मिलता था...और वह हर वक्त भूख महसूस करता रहता था। दूसरे रसोइये तो इस समस्या का हल बीच-बीच में थोड़ा-बहुत मुँह में डालकर कर लेते थे, लेकिन इसके लिए यह संभव ही नहीं था, क्योंकि सावित्री सब चीज़ें अलमारी में ताला लगाकर बंद रखती थी और खुद अपने हाथों से उसे जरूरी चीजें निश्चित मात्रा में देकर चली जाती थी।

‘पता नहीं, मालिक क्यों कभी खुश नहीं होते ! मैं तो अच्छा से अच्छा बनाने की कोशिश करता हूँ। आदमी इससे ज्यादा क्या कर सकता है ?’’

पति के भाषण की तरह रसोइये की शिकायतें भी रोज़ की बात थी, इसलिए सावित्री चुपचाप खाना खाती रही और ध्यान ही नहीं देती थी। अब वह बाबू के बारे में सोचने लगी। बेटा सचमुच बीमार लग रहा था और हो सकता है, क्लास में उसकी हालत और भी खराब हो गई हो। वह सोचने लगी कि वह कितनी बेबस थी, घर के मामलों में कुछ भी नहीं कर सकती थी, और शादी के पंद्रह साल बाद उसकी यह स्थिति थी। बाबू बीमार था लेकिन वह उसे आराम करने को भी नहीं कह सकती थी। वह सोचने लगी कि शादी के बाद शुरू के ही सालों में अगर वह कुछ ज्यादा सख्ती से काम लेती तो आज स्थिति खराब न होती। आजकल की लड़कियाँ तो शादी के बाद पतियों को पूरी तरह अपने काबू में कर लेती हैं, उसकी सहेली गंगू ही है जिसने अपने पति पर पूरी नकेल डाली हुई है।

खाना खाकर वह हॉल में पड़ी हुई अपनी बेंच पर जा लेटी, मुँह में पान और सुपारी के टुकड़े डाले और तमिल की एक पत्रिका उठाकर पढ़ने लगी। आधे घंटे में पूरे घर में शांति छा गई। नौकर ने उस दिन के कपड़े धोकर सूखने डाले दिये थे और आराम से बीड़ी पीने के लिए सामने वाली दुकान पर जाकर बैठ गया था; रसोइये ने भी किचेन का काम निबटा लिया था और एक काफी हाउस में अपने दोस्तों के साथ गपशप करने और अपने घरों की राजनीति पर टीका-टिप्पणी करने चला गया था। बगीचे के पक्षियों और कौवों की एकाध आवाज़ कभी-कभी यह शांति भंग कर देती थी। पत्रिका पढ़ते-पढ़ते सावित्री ने भी एक नींद ले ली।

एक्सटेंशन एलीमेंटरी स्कूल में एक बजे की घंटी बजी, तो सावित्री चौंककर उठ बैठी। इन्टरवल की छुट्टी हो गई थी और उसकी दोनों बेटियाँ सुमति और कमला, अभी कूदती हुई आ रही होंगी। सावित्री उनके खाने के लिए भात और दही मिलाने किचेन में जा पहुँची। उसने किचेन में अलमारी को खोला ही था कि गोलमटोल छोटी-सी कमला, पतली-सी चुटिया लटकायें, उछलती-कूदती भीतर घुस आई और पत्ता निकालकर झटपट खाना खाने बैठ गई। दौड़कर आने के कारण वह हाँफने लगी थी।

‘मैंने तुम्हें कितना मना किया है कि धूप में इस तरह दौड़कर मत आया करो। सुमति कहाँ है ?’
‘सहेलियों के साथ आ रही है।’
‘तुम उसके साथ क्यों नहीं आईं ?’

‘वह मुझे अपने साथ नहीं रखती। वे आठवीं क्लास में पढ़ती हैं।’
कमला ने जल्दी-जल्दी कई ग्रास मुँह में भर लिये और उठने लगी। सावित्री ने उसे पकड़कर फिर से बिठा लिया और बोली, ‘भात पूरा खत्म करो। मैंने बहुत थोड़ा दिया है।’ कमला ने अपने को छुड़ाने की कोशिश की।

‘माँ, देर हो रही है। मुझे जाना है। दिन भर खाती ही रहुँगी क्या...?’
‘पूरा खत्म कर लोगी तो तीन पैसे मिलेंगे।’

यह सुनते ही कमला खाने बैठ गई और स्कूल की उस दिन की कहानियाँ सुनाने लगी। ‘आज टीचर ने सम्बू को छड़ियों से पीटा। बड़ा खराब लड़का है वह। उसने एक लड़के को पत्थर मारा था। वह रोज़ मुझे धमकी देता है कि कापियाँ छीन लेगा।’
खाने के बाद कमला अपनी किताबें और स्लेट उठाकर जाने को तैयार हुई, कि सुमति घर में घुसी। उसने डपटकर पूछा, ‘तुम अभी स्कूल जा रही हो ?’
‘हाँ।’

सुमति बोली, ‘माँ, तुम कमला को इतनी जल्दी क्यों जाने दे रही हो ? अभी तो आधा घंटा बाकी है।’
‘मुझे जाना है...कुछ काम है।’ यह कहकर कमला गायब हो गई।
सुमति अपनी मेज़ के पास गई, सवेरे की किताबें सँभालकर रखीं और शाम की क्लासों की किताबें निकालीं, अपनी कापियाँ करीने से एक के ऊपर दूसरी रखीं उनके ऊपर गत्ते का पीला डिब्बा रख दिया जिसमें कई पेंसिलें, एक रबड़ और कुछ रंगीन धागे रखे थे। डिब्बा खोलकर उसने पेंसिलों की नोंकें जाँचना शुरू किया कि ठीक से बनी हैं या नहीं। तभी सावित्री वहाँ आ पहुँची और कहने लगी, ‘बड़े आराम से कर रही हो ?’

‘आज संगीत का टीचर देर से आयेगा।’
‘भात तैयार है तुम्हारा।’
यह सुनकर सुमति ने चेहरा टेढ़ा करके कहा, ‘माँ, मुझे भूख नहीं है।
माँ ने घूरकर उसे देखा और बोली, ‘मैडम, मुझे ज्यादा परेशान मत करो।’ ‘मैं भात खा-खाकर थक गई हूँ, सवेरे भात, दोपहर को भात, शाम को भात।’

फिर वह चुपचाप किचेन में जाकर बैठ गई। सावित्री उसे खाना खाते देखती और सोचती रही कि यह लड़की दिनों दिन दुबली क्यों होती जा रही है। ग्यारह साल की हो रही है लेकिन उतनी ही है जितनी तीन साल पहले थी और कोई फूँक मार दे तो उड़ जाएगी। यह कुछ बुरी बात भी नहीं है; यह अनुवांशिक भी हो सकता है, दादी पर गई लगती है—वही शक्ल, वही साँवला रंग, छोटा मुँह, छोटी-छोटी आँकें और सीधे खड़े बाल। ‘मेरी माँ भी चालीस साल पहले ऐसी ही रही होंगी।’

सुमति बोली, ‘माँ, मुझे सोमवार को चार आने चाहिए।’
‘किस लिए ?’
‘मुझे कढ़ाई की किताब खरीदनी है।’
‘अच्छा। यह बताओ कि तुम कमला को अपने साथ क्यों नहीं लाती, वह अकेली सड़क पर दौड़ती क्यों आती है ?’


अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book