रहिये अपने गावाँ जी - मनोज कुमार सिंह Rahiye Apne Gavan Ji - Hindi book by - Manoj Kumar Singh
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रहिये अपने गावाँ जी

मनोज कुमार सिंह

प्रकाशक : विश्वविद्यालय प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :86
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7585
आईएसबीएन :978-81-7124-541

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लोक-रागों की महत्ता...

Rahiye Apne Gavan Ji - A Hindi Book - by Manoj Kumar Singh

‘गीत-गोविन्द’ को लेकर पूर्वी क्षेत्र में ही कविता के माध्यम से साधुता, वैराग्य और पाखण्ड-विरोधी दर्शन की स्थापना हुई। खाना-पीना, उठना-बैठना, घूमना–फिरना, जीवन और मरण के बन्धनों में रहते हुए जीने की कामना के साथ मृत्यु के अटल सत्य पर विश्वास पहली बार कविता का विषय बना। इसकी भूमि भारत का पूर्वी हिस्सा ही रही है। जहाँ देवपूजा के समानान्तर सूर्य की पूजा प्रारम्भ हुई। यह पूजा पुरी से शुरू होकर द्वारका तक जीवन को ही साधुता कहने वाले और कविता को जीवनचर्या मानने वाले सिद्धों के द्वारा पहली बार चिह्नित होती है। आसन, सिंहासन, गादी, पीठ के बिना जिस रचना का व्याकरण, संगीत, सुर, ताल और ऋतु तथा बेला से जुड़ा हो वह गेय पद साधु रचनाओं में ‘पद’ कहा जाता है। यह संगीतात्मकता ही उसका व्याकरण है, उसका लिंग है, वचन है, कारक है, कारक अर्थात् क्रिया को कराने की क्षमता रखने वाला।
पूरब रंग की तमाम लिखित और मौखिक परम्पराओं के साथ राग और संगीत का सीधा सम्बन्ध है।
कविता, विशेष रूप से पूरब रंग की साधु-कविता सम्पूर्ण अभिव्यक्ति है।

प्रथम अध्याय

धुर पूरब और पूर्वी रंग का मतलब

कट्टर सामन्ती विरोध और अपने ही धम्म में अनेक शाखाओं-प्रशाखाओं, मठ, आराम, विहारों के निर्माण के साथ मूर्तिकल्प, गुह्यचित्र और तन्त्रसाधना से सम्बन्धित खेचरी मुद्राएँ, अष्टमात्रिका तथा उपदेवता, इत्यादि के परिणामस्वरूप एवं वज्रयान के भीतर ब्रजौली साधना में ललना, रसना, अवधूती, डोम्बी और द्विजा, साधना द्रव्य के रूप में उपयोग एवं बजरौली, पंचमकार, चमत्कार, गोपनीयता इत्यादि के कारण बौद्ध धर्म अपनी लोकप्रियता खोने लगा। आठवीं शताब्दी तक आते-आते सनातनी और बुद्ध के समानान्तर छः नास्तिक साधना पद्धतियाँ जिनमें आजीवन गोशाल, अजित केशकम्बली, कात्यायन, कश्यप, संजय वगैरह के कारण बौद्ध धर्म एक तरह से पुरावशेष का रूप लेने लगा। दूसरी ओर बौद्ध धर्म में संस्कृत और शास्त्रवाद के कारण पालिमार्ग (गाँव और गाँव की भाषा) का रास्ता छूटा और ईसा के दो सौ वर्ष पहले बौद्धों की भाषा संस्कृत होने लगी। कम्बोडिया, श्रीलंका, तिब्बत, थाईलैण्ड अनेक देशों में बौद्ध धर्म बस गया। इस पूरी प्रक्रिया का असर भारतीय जागरण पर पड़ा। आकस्मिक नहीं है कि बौद्ध और उससे जुडा हुआ एक समाज लोक जीवन में भी लोकनिर्वासित ऊर्जा से सम्पन्न हुआ। साथ ही शास्त्र, संस्कृत भाषा और विप्र वर्चस्व की तमाम प्रतिज्ञाओं से संघर्ष करने के लिए तैयार हुआ।

यह तीसरा समाज जो लोक में रहते हुए भी लोकनिर्वासित था और इस संसार में रहते हुए भी संसार को नश्वर मानता था। साथ ही संसार से जुड़ी हुई तमाम आस्थाओं वेद, ब्राह्मण, पाण्डित्य, संस्कृत जीवन, सनातन आस्थाओं ईश्वर निष्ठा के अनेक रूपों से भी अलग हो गया। इस समाज की सबसे बड़ी उपलब्धि नये तरह से सृष्टि की कल्पना है। जो पिण्ड में है वही ब्रह्माण्ड में है। मैं ही ब्रह्म हूँ की जगह पर सोहं वह मैं ही हूँ का उलट-फेर अहं ब्रह्मास्मि के विरोध में सोहं अनलहक की धारणा है। इस तरह इस समाज ने जीव, माया के विषय में अलग तरह से सोचा। इस चिंतन के अवशेष गोरखनाथ की रचनाओं, सिद्धों के चर्यापदों, कबीर जैसे तमाम संतों के रमैनी कविताओं, अष्टपदी, द्विपदी, द्वादशपदियों या बाद की गोष्ठी, तिलक, बोधपोथियों में मिलते हैं। यह नये तरह का विद्याबाल था जिसे न लोक में मान्यता प्राप्त की, न शास्त्र में, लेकिन इस ज्ञान के प्रति उत्तर भारत और पूरे भारतवर्ष में विस्मय, भय और रिरंसा अवश्य थी। यह समाज व भिक्षु था, न भिखारी। मस्त मौला लोगों का समाज था, अपनी गाते हुए विचरना, कहीं, कोई आसन नहीं, थान, बथान, संस्थान नहीं केवल गाते हुए चलते रहना, ऐसी रचनाओं के अवशेष चर्यापदों में मिलते हैं। बाद में गोरखबानी में, और बाद में संतों की रचनाओं में इन रचनाओं के अनेक रूप मिलते हैं। 16 रागों से लेकर 36 राग, रागिनियों और ऋतु तथा बेला से सम्बन्धित लोक-रागों में भी इन कविताओं के मार्ग और देशी रूप पाये जाते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि कविताओं को मार्ग और देशी में गाने की पूर्वी शैली का भी इसमें उद्भव हुआ। अगर राग गौड़ी है तो पूर्वी गौड़ी उसका एक भेद हैं, आश्चर्य की बात यह है कि शुद्ध पश्चिम पंजाब में संकलित होने वाली रचनाओं को भी पूरबी ठाठ और रंग में संकलित किया गया है। उसका कारण यह है कि बुद्ध का कर्म-क्षेत्र मुख्य रूप में बिहार, और बिहार के बाहर का थोड़ा सा हिस्सा है। ‘गीत गोविन्दम्’ के कारण पूर्वी राग-शैलियाँ बहुत लोकप्रिय थीं। गीत गोविन्दम् के पहले अष्टपदी तो गायी ही जाती थीं। इसलिए साधु कविताओं की मुख्य भूमि पूर्व तथा बिहार, गोरखपुर, बलिया का पूर्वी हिस्सा, नेपाल का कुछ हिस्सा और बंगाल का बहुत सारा हिस्सा अनजाने पूरब रंग में प्रसिद्ध होता चला गया। पूरबी राग की एक खास शैली भी है और पूरबिया शब्द एक जातीय विशेषण भी है। ऐसे लोगों की मिलीजुली बोल को ‘पूरबी’ कहते हैं–पूर्वी का अर्थ है गाने योग्य, लयदारी से भरा हुआ, अर्थ के उत्तर पार बोधगम्य, सरल प्रभावशाली और कम से कम पुरुष। पूर्वी का अर्थ उदय स्थल भी है अर्थात् सूर्योदय का स्थान जहाँ नये विचार उत्पन्न हों जहाँ से नई रोशनी दिखायी पड़े। पूर्वी का अर्थ रहस्यमय भी होता है, अंधेरे को पार करता हुआ। शायद इसीलिए सिद्धों के राग अधिकांशतः ब्रह्मबेला में प्रारम्भ होते थे। उन्हें भैरवरंग और पूर्वी भैरवी भी कहते थे। पूरब का अर्थ अंधेरे से निकला हुआ या निकलता हुआ भी होता है। शीतलमन्द पवन के लिए पूरब से आने वाली हवा को स्मरण किया जाता है। पूरब का अर्थ होता है इस संसार से पहले का । पूर्व-जन्म तो कहा जाता है लेकिन पश्चिम-जन्म तो नहीं कहा जाता।

पूरब को साधु देश भी कहा गया है। अनेक सम्प्रदायों के साधु, संत, गोरख कबीर पूरब में ही पैदा हुए। इसलिए पूरब-रंग का अर्थ होता है साधु और मौलिक चिंतन का रंग जिसमें गीत की मधुरिमा और अनजाने सुनने की क्षमता हो। पूरब का अर्थ होता है मेहनत, मजदूरों का इलाका। रागनट नारायण, साबरी, कहरवा, अहीर भैरव अनेक श्रमिक जातियों से रागों का जो सम्बन्ध है, वह इस बात की सूचना देता है कि पूरब में समझने से ज्यादा बूझने की शक्ति होती है, तर्क से अधिक आस्था होती है। पूरब रंग को समझाया तो नहीं जा सकता लेकिन समझा जा सकता है। इन सारे अर्थों को ध्यान में रखते हुए ही संत कबीर ने अपनी एक साखी में कहा है–‘‘बोली हमरी पूरबी, हमें लखै नहीं कोय। हमको तो सोई लखै जो धुर पूरब का होय’’। इस साखी के अनेक अर्थ लगते हैं। कबीर किसी बोली की बात करते हैं भाषा की नहीं। वह ब्रज (ब्रजबुली), अवधी, भोजपुरी, राजस्थानी, मैथिली, मागधी कोई हो सकती है। बात बोल या स्पीच की है। अर्थात् भाषा कोई भी हो कबीर की स्पीच, बोली, आइडोलेक्ट धुर पूरब की है। पूरब की चिन्ता साधना कहने की तरकीब और तरतीब से बोली का सम्बन्ध है। इसको समझने के लिए इंग्लिश, हिंग्लिश, अमेरिकन इंग्लिश, हाईब्रीड इंग्लिश जैसे अंग्रेजी शब्दों के अन्तर और अभेद को समझना होगा। हिन्दुस्तान में अंग्रेजी बोली जायेगी वह हिंग्लिश हो जायेगी। बलिया में खड़ी बोली हिन्दी बोली जायेगी उसका भोजपुरी रंग होगा। पंजाब के हिन्दी की रंगत पंजाबी होगी। दरअसल भाषा बोली का कलेवर है। कबीर शायद यही बात कहना चाहते हैं कि मेरी बोली अर्थात् उसका अन्तः अनुपात, पदबन्ध, महावरे पूरब के हैं जिसे धुर पूरब का आदमी समझता है। पश्चिम के आदमी के लिए वह शब्दार्थ का ‘कहियत भिन्न न भिन्न’ संकुल है। गिरा और अर्थ है। पूरब के लिए सीधे शब्दार्थ के आर और पार समझने की चीज है। वह शब्दार्थ की गीत में नहीं; बोध और विवेक में सम्प्रेषित होती है। वह शुद्ध अर्थ है अर्थात् नहीं।

प्रश्न यह है कि कबीर अपने श्रोता को धुर पूरब का द्रष्टा क्यों कहते हैं। वे अर्थ लगाने की बात नहीं करते, अर्थ देखने की बात कहते हैं। यह भी कहते हैं कि कबीर और उनकी बोली का अन्वय नहीं हो सकता। दोनों एक ही हैं। कबीर को देखना उनकी बोली को देखना है। इस तरह अनेक भाषाओं में अपलब्ध संत कबीर की रचनाएँ और अनेक संतों की कई भाषा-रंगों की रचनाएँ धुर पूरब की पूर्वी बोली हो जाती है। विद्यापति की मैथिली और अवहट्ट में भेद है लेकिन दोनों पूर्वी है। तुलसीदास की अवधी और ब्रज में भेद है लेकिन दोनों पूरबी हैं। अयोध्या, बनारस, चित्रकूट और प्रयाग की बोली भी पूर्वी है, ब्रज और मथुरा की पछाहीं नहीं है। यहीं यह स्पष्ट हो जाता है कि कबीर ही नहीं; अनेक संत और साधुओं की रचनाएँ धुर पूरब की समझ रखने वाले श्रोताओं और पाठकों के लिए पूर्वी बोली में लिखी गई थीं। ऐसे संतों में कबीर और रैदास तो हैं ही धन्ना, पीपा, सदना, सेन के साथ बावरी पंथ की बावरी साहिबा, बुल्ला साहब, गुलाल साहब, भीखा और अनेक भाट जोगी कवियों के साथ पलटू दास, छत्तीसगढ़ के धर्मदास, आमनी देवी और बनारस के कीनाराम, बिहार के अनेक सरभंगिया, सखी सम्प्रदाय के कवि, कई पुष्टि मार्गी, बलिया के शिवनारायण, दरियासदास बिहार वाले, सैकड़ों संत, साधु, साध, निर्गुनिया, जंगम और भगत कई बार धुर पूरब की संस्कृति से जुड़े हुए निठाह पश्चिम के कवि होते हैं। बिलग्राम के कई सूफी पूर्वी रंग के है। बहुत पीछे चर्यापदों वाले सिद्ध भी पूर्वी रंग के है। इनकी बोली में ब्रज बुलि, पुरानी बंगला, पुरानी मैथिली और प्राचीन भोजपुरी के दर्शन होते हैं। सिद्धों की भाषा को जो अनेक नाम दिये गये है, वह धुर पूरब के पूर्वी रंग के कारण ही इस तरह बिजनौर के रहने वाले पानपदास की ‘एजी’ सम्बोधन के साथ जो अनेक रचनाएँ मिलती हैं वे भी पूर्वी रंग की ही हैं। उन्होंने बाकायदा पूर्वी राग में अनेक कविताएँ लिखीं। भाषा कुछ भी हो यदि राग पूर्वी है तो उसे धुर पूरब का ही रंग मानना चाहिए। पानपदास की रचनाओं में गुरु आरती, सोहला, सबदी और अनेक रागों का अनुयोग पूर्वी रंग में हुआ है। इस तरह धुर पूरब के पूर्वी रंग के अनेग संतों की बानियाँ पूरब से पश्चिम तक अर्थात् मुख्यतः बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बंगाल और उड़ीसा की सीमाओं में पायी जाती हैं। इन सब में काव्य रूप, छंद और राग-रागनियों से सम्बन्धित एक ऐसा ग्रन्थबद्ध तारतम्य है कि उन्हें धुर पूरब की पूर्वी बोली का संत साहित्य कहा जा सकता है।

इस तरह के साहित्य में मुख्य रूप में बीजक, रमैनी, सबदी, साखी, चाँचर बेइली, चौतीसा, विप्रमतीसा, झूलना, फाग महत्वपूर्ण हैं। इसी तरह राम जहाज में बावरी साहब, बीरू साहब, यारी साहब, बुला साहब, गुलाल साहब, भीखा साहब, चतुर्भुज साहब, नाल सिंह, कुमार साहूब, मरदन सिंह, जय नारायण साहब इत्यादि संतों के सबद रागबद्ध रमैनी सोरठा और बंगला राग की रचनाएँ आलिफनामा, रास, गोष्ठी, बानी, कहरा, ककहरा, साखी, आरती, अरिल्ल, सहस्त्रनाम, चौपाई, रेखता, स्तुति, समझ मात्रा, सोहला, नामस्त्रोत, ज्ञान सुखमनी, पंचम वचाणी, कडकै, नाम वीणा, जोगदर्शन, गगनडोरी, सुमरिन, कायाशोध, भक्तिमुख, झूलने, तत् उपदेश, इश्कगर्क, सबदमार्फत, जंगला, हरिजस, बारहमासा अनेक काव्य रूपों में संतों की रचनाएँ पूर्वी रंग में गठित हैं। इनमें साखी, दोहा और सलोक प्रायः एक भी हैं और एक दूसरे से भिन्न भी हैं। इस तरह से सबद पद और बानी प्रायः एक हैं और कई बार कई स्तरों पर भिन्न है। ये तीनों निर्गुण भी गैं निर्वाण भी। साथ ही ये गायन, कीर्तन, सुमिरन भी हैं। इस तरह काव्य रूपों का एक विचित्र संसार पूर्वी रंग की कविताओं को एक दूसरे से जोड़ता है और अलग करता है। श्रद्घा, विश्वास और गायन शैली के मिले-जुले प्रभाव से भी कई नामकरण होते हैं। अगर श्रद्धेय शिव हैं, गाने की एक निश्चित पूर्वी शैली है तो उसे ‘नचारी’ कहने की परम्परा है। यदि कोई देवी हैं तो उसे ‘पचरा’ कहते हैं।

राग और छंद भी कई बार एक दूसरे के पर्याय हो जाते हैं। ये अलग भी हैं और अभिन्न भी। सोरठा, सोरठी राग है और सोरठा एक छंद भी है। इस तरह पूर्वी रंग के संतों की वाणी का काव्य रूप, रूपक भी है और छंद तथा राग से अपना रंग भी लेता है।

अनेक बोलियों और भाषाओं के अपने कवि के रूप में अपनी पहचान बनाये हुए कबीर कहते हैं कि ‘‘हमको तो सोई लखै, जो धुर पूरब को होय’’ ऐसी स्थिति में धुर पूरब का अर्थ बनता भी है और तमाम तरह के प्रश्नवाचक चिह्नों से घिर भी जाता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की दृष्टि में संत हिन्दुओं का मन खट्टा करता है। पंडित हजारीप्रसाद द्विवेदी की आलोचना में ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ से सभी धर्मों, सम्प्रदायों के रास्ते एक दूसरे को काटते हुए दूर-दूर तक चले जाते हैं। वह अक्खड़ भी है, फक्कड़ भी है, सधुक्कड़ भी है। ऐसी स्थिति में कबीर को ही लेकर यह स्पष्ट करना मुश्किल है कि धुर पूरब का मतलब क्या है ?

संगीत के रागों में पूरबी धुन का बहुत महत्त्व है। पूरबिया का अर्थ होता है मीन, मधुर, ठण्डा-ठण्डा सुख देने वाला, आलस जगाने वाला। इसलिए पूरवा हवा के साथ ये धारणाएँ जुट गयीं। पछुआ का अर्थ होता है–सूखा-सूखा, उदास, सूर्य की तरह डूबता हुआ। लेकिन पूरब का अर्थ होता है सूर्य की तरह उगता हुआ। कबीर की कविता ऐसी भाषा का उदय है, जिसके बारे में तुलसी के प्रमाण से कहा जा सकता है–‘‘विकसे संत सरोज सब, हरषे लोचन भृंग।’’ अर्थात् जिसे सुनने पर संतों का कोमल हृदय कमल के फूल की तरह खिल उठता है और आँख रूपी भौंरें प्रसन्न हो जाते हैं। वस्तुतः पूरब दिशा भी है, दशा भी है, भाव, अनुभाव, संचारी के साथ विभाव भी है। वास्तव में कबीर के प्रमाण से ही पूरब रंग की कविता मौखिक परम्परा की कविता है–‘‘मसि कागद छूय्यौ नहिं, कलम गह्यौ नहिं हाथ। चारि युग को महातम् मुखहि जनाई बात।’’ इसके साथ ही कबीर भी कहते हैं–‘‘यह तन जार्यौ मसि करौ, लिख्यौ राम को नांव। लेखिन कर्यौ करंक की लिखि-लिखि राम पठाऊँ।’’ अर्थात् जब उन्हें दुनियादारी की बात कहनी होती है तो निर्गुण बानी बोलते हैं और ऊँचे अध्यात्म की बात करनी होती है तो वे राम के नाम राम ही लिखकर भेंज देते हैं। ऐसी रचनाओं को निर्वाण पद कहा जाता है। पद अर्थात् जिसमें निर्वाण से सम्बन्धित वचन, कारक, लिंग लगा हो। जो आ, जा, खा जैसी इकहरी क्रिया होती हुई भी अपने आप में वाक्य हो। कबीर की इस महत्ता को समझते हुए पूरब रंग की कविता को समझने के लिए हम पूर्वकालिक एवं पूर्व क्षेत्रीय साधु इतिहास में पहुँच जाते हैं। यह साधु इतिहास प्रमाण सहित हमें सिद्धों की रचनाओं में मिलता है।

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