अमुक्तक - हरी बिन्दल Amuktak - Hindi book by - Hari Bindal
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अमुक्तक

हरी बिन्दल

प्रकाशक : अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1995
पृष्ठ :70
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 6423
आईएसबीएन :0000000000

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अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति का सातवाँ पुष्प अमुक्तक हास्य एवं व्यंग्य का काव्य संकलन सुधी पाठकों के रसास्वादन के लिए प्रस्तुत है...

Amuktak a hindi book by Hari Bindal -अमुक्तक - हरी बिन्दल

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

इस पुस्तक में हास्य व्यंग्य की काफी कवितायें काका हाथरसी के हास्य व्यंग्य के नमूने पर हैं, कुछ सुरेन्द शर्मा की ‘चार लाइनों’ के नमूने पर, एक कविता ‘मूड’ भवानी प्रसाद की एक मशहूर कविता के नमूने पर, और बाकी सब कवितायें खुद में एक नमूना हैं।

प्रकाशकीय


अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति का सातवाँ पुष्प अमुक्तक हास्य एवं व्यंग्य का काव्य संकलन सुधी पाठकों के रसास्वादन के लिए प्रस्तुत है। इस संकलन के कवि श्री हरिबाबू बिन्दल पेशे से इन्जीनियर पर मन से मुक्त कवि हैं सहृदय एवं संवेदनशील व्यक्तित्व के धनी। वह अमुक्तक लिखने के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति के कर्मठ कार्यकर्ता भी हैं।

अमुक्तक साहित्य का सबसे बड़ी विधा हास्य व्यंग्य की बानगी है। बिन्दल जी ने अमुक्तक के माध्यम से सामाजिक, राजनैतिक, और सांस्कृतिक क्षेत्रों में व्याप्त विसंगतियों पर तीखा एवं चुटकीला प्रहार किया है। इसलिये यह अमुक्तक कभी तो आपको हँसायेगा या कभी रुलायेगा। प्रसिद्ध अँग्रेजी साहित्यकार मैरीडथ के अनुसार 'व्यंग्यकार एक सामाजिक ठेकेदार होता है, बहुधा वह एक सामाजिक सफाई करने वाला, जिसका काम गंदगी के ढेर को साफ करना है।' बिन्दल जी के अनुसार मैरीडथ की व्यंग्यकार की परिभाषा पर खरे उतरते हैं। विश्वास है कि बिन्दल जी की इस कृति का हिन्दी जगत में असामान्य स्वागत होगा और बिन्दल जी की कलम से अशेष अमुक्तक मुक्त होते रहेंगे तथा समिति के प्रकाशनों में वृद्धि करते रहेंगे।
रवि प्रकाश सिंह

आभार


इस पुस्तक के प्रकाशन में कई व्यक्तियों ने सहयोग एवं साहस दिया है, मैं उनका आभारी हूँ। डा. चन्द्रिका प्रसाद, बुई मैरीलैंड एंव श्रीमती सुधा धींगरा, राले नोर्थ कैरोलिना ने प्रूफ रीडिंग, तथा मेरे बेटे नीरज बिन्दल ने टाइप सैट किया, इसके लिए मैं हृदय से उनका धन्यवाद करता हूँ। कुँवर चन्द्र प्रकाश सिंह एवं डा. रवि प्रकाश सिंह, अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति के संस्थापक एवं संरक्षक, ने कविताओं को पुस्तक रूप में बाँधने का साहस बँधाया इसके लिए मैं उनका आभारी हूँ। भारत से अमेरिका आने वाले सभी कवियों ने मेरी कवितायें सुनी और उन्होने भी इन्हें पुस्तक रूप देने की राय दी, उनमें अग्रणीय हैं काका हाथरसी, डा. वीरेन्द्र तरुन, डा. वीरेन्द्र अवस्थी, तथा श्री हुल्लड़ मुरादाबादी। मैं इन सबको यह पुस्तक भेंट करता हूँ।

हरीबाबू बिन्दल

दो शब्द


ठहाकों की कीमत तो उनसे पूछिये जो आहों का कारोबार करते हैं। वर्तमान दौर में घुटन कुंठा संत्रास तथा मानसिक तनाव मानव जीवन की उपलब्धि हो गये हैं, सहज हास्य किसी कोने में मुँह छिपाये पड़ा है। ऐसे मौसम में अपनी हास्य रचनाओं से दूसरों को खिलखिलाने के लिए मजबूर कर देना एक बहुत बड़ी उपलब्धि हैं।

जिन्दगी में दम बहुत हैं हर कदम पर हादसे
रोज कुछ टाइम निकालो मुस्कराने के लिये।

श्री हरीबाबू बिन्दल ने अमुक्तक की रचना करके हास्य व्यंग्य की दुनियाँ में एक नया आनन्द स्रोत सृजन किया है।
उनकी रचनायें मैंने सुनी भी हैं और पढ़ी भी हैं। बिन्दल जी का यह प्रयास सराहनीय और प्रशंसनीय है।
अमुक्तक में कई हास्य रचनायें तो बेजोड़ हैं, इनमें व्यंग्य के पुट तो हैं ही साथ में दार्शनिकता का समावेश भी है। उनकी सहज भाषा, सरल शब्द, कटु यथार्थ अन्तर्मन की गहराइयों को छू लेने में समर्थ है। अमुक्तक जैसे सार्थक हास्य-व्यंग्य काव्य संग्रह मेरी हार्दिक बधाइयाँ। मेरी कामना है कि बिन्दल जी इसी प्रकार दुखी मानवता को नये आयाम देते रहें।
यदि धर्म की परिभाषा एक ही पंक्ति में कहनी हो तो कहा जायेगा, ‘दूसरों को हँसाना पुण्य है और किसी को रुलाना पाप’। बिन्दल जी के इस पुण्य कार्य को प्रणाम करते हुए अपनी हार्दिक शुभकामनायें समर्पित करता हूँ। भविष्य में उनसे और भी आशायें हैं।

आत्मकथ्य


मुक्त मन से लोग मुक्तक लिखते होंगे किन्तु मन मुक्त होते ही कहाँ हैं। हरिद्वार या काशी में तो होते भी होंगे, अमेरिका में तो मन बिल्कुल ही अमुक्त हैं। उनसे तो ‘अमुक्तक’ ही लिखे जायेंगे। यही भाव है इस पुस्तक के शीर्षक का। अमेरिका में लिखी गई हिन्दी की छोटी बड़ी हास्य-व्यंग्य की कवितायें। वैसे तो कुछ हास्य पहले भी लिखा करता था, किन्तु सन् 1984 में पहली बार जब काका हाथरसी को अमेरिका बुलाया और उनके साथ काफी वक्त गुजारने को मिला तो हास्य से कुछ और अधिक लगाव हो गया। सोचा, लिखने की सार्थकता इसी में ज्यादा है कि लिखने के साथ-साथ अपने मित्रों का मनोरंजन भी हो।

अमुक्त मन कभी उन्मुक्त होता है तो कभी विमुक्त भी। जैसे अमुक्त मन से लिखे हुए को अमुक्तक कह सकते हैं, वैसे ही उन्मुक्त मन से लिखे को ‘उन्मुक्तक’, तथा विमुक्त मन से लिखे को ‘विमुक्तक’। अमुक्त, विमुक्त, और उन्मुक्त मन से लिखी गई अमुक्तक, विमुक्तक, तथा उन्मुक्तक कवितायें एक ही पुस्तक में आपके सामने प्रस्तुत हैं। यह कवितायें काव्यरस का बदलाव तो करेंगी ही साथ में हास्य-व्यंग्य के महत्त्व को भी सार्थक करेंगी। ये सभी कवितायें स्वान्त सुखाय लिखी गई हैं, किन्तु इन्होंने अपने मित्रों का मनोरंजन भी किया है इसीलिये इन्हें पुस्तक रूप में बाँधना उचित समझा।

क्लिष्ट और कोरी भावुकता की भाषा में मुझे विश्वास नहीं, इसीलिये बड़ी साधारण और सरल भाषा में काफी खुल कर लिखा है। कहीं कोई दार्शनिकता नहीं है। उल्टे, कुछ अश्लील और छिछले भाव भी जहाँ-तहाँ प्रयोग में आये हैं। पाठक इन्हें हास्य परिहास्य का अंग मान कर मुझे क्षमा कर देंगे, ऐसा निवेदन है। विषय अमरीकी भारतीय राजनीति से लेकर ‘मूड’, ‘मोक्षा’, कुछ असंगत विषय जैसे ‘हवा’, और कुछ बेमतलब शब्द, जैसे ‘(अ) मेरिका’ तक हैं। मेरी कवि कहाँ तक गुणात्मक दृष्टि से आपको गुदगुदा सका है, यह जानने की इच्छा रहेगी। जो कुछ लोगों का मन भी खुश हुआ तो मैं अपनी मेहनत को सफल समझूँगा।
पढ़िये हास्य-व्यंग की तरंग अमुक्त, विमुक्त, और उन्मुक्त मन के संग।


मूड


मूड हो आया है सुनाने का,
इसीलिये सुना देते हैं।
वर्ना लोग तो न
सुनाने का मूड बना लेते हैं।
मूड एक अच्छा बहाना है,
इसका भी क्या गाना है।
तो इसका भी क्या गाना है।
तो मैं गा नहीं रहा हूँ
मूड की कुछ बानगी, पेश कर रहा हूँ।
लीजिये सुनिये,
मूड एक अच्छी चीज है, बनाइये
बना कर, अपनी कमियाँ छिपाइये।
मूड बुरा भी है,
गुस्से में लोग भाल-बुरा कुछ नहीं सोचते
दरोगा सिंह दहाड़ कर दाढ़ी को नोचते।
अच्छा अब बताइये, मूड कब रिस्की होता है।
अब सुनिये मूड कुछ उम्र के लिहाज से
आप उतर आइये कल्पना के जहाज से।
बच्चों का मूड ? कुछ पता नहीं चलता
जवानी में मूड ? नाजुक हो मचलता।
बुढ़ापे में मूड ? कुछ कर नहीं पाते हैं।
कुछ हुआ तो नाराज हो सो जाते हैं,
बहू बेटे मनाते हैं, तब खाना खाते हैं।
अब सुनिये साहब का मूड,
अच्छा है, काम बन जायेगा।
चपरासी, मूड में फन्की लगायेगा।
हमारा मूड ? कुछ सनकी है
आपका मूड भी कुछ ऐसा ही है
लगता है बीबी से खनकी है।
हमारा मतलब आपकी बुलन्दी से नहीं
कविता की तुकबंदी से है।
अब जरा सुनिये पत्नी का मूड
वह बड़ा मुश्किल है
उसके लिये कुछ समझदारी से काम लो,
कुछ लालच दो, और अपने फेवर में बदल लो
मूड बहुत सारे हैं मूड की कमी नहीं
किन्तु इससे आगे,
अपनी तुकबंदी जमीं नहीं।


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